2014 में मोदी लहर चली उसके बाद कई राज्य भी भाजपा जीत गई, कांग्रेस मुक्त भारत नारा दिया गया लेकिन कभी सोचे हो 2014 के बाद भाजपा ने कांग्रेस को शून्य पर कितने राज्य के विधानसभा चुनाव में गिराया? कांग्रेस कितने राज्य में भाजपा का मोदी लहर के वावजूद शुन्य पर गिराया.!
1. दिल्ली- कांग्रेस 0 सीटें
2.बंगाल- भाजपा 03 सीटे
3.पांडचेरी- भाजपा 0 सीटें
4.केरल- भाजपा 0 सीटें
5.तमिलनाडू- भाजपा 0 सीटें
6.पंजाब- भाजपा 0 सीटें
7.गोवा में कांग्रेस बड़ी पार्टी
8.मनिपुर में कांग्रेस बड़ी पार्टी

अभी दिल्ली,असम, छत्तीसगढ, राजस्थान, पंजाब, त्रिपुरा, चण्डीगढ के सभी विश्वविद्यालयों में कांग्रेस के इकाई छात्र संगठन NSUI लगातार जबरदस्त जीत हासिल किया इससे देश का युवा की सोच साफ जाहिर कर रहा है, कांग्रेस के प्रति झुकाव बढ रहा है.! तभी कांग्रेसी कार्यकर्त्तां और नेता से ज्यादा भाजपा नेताओं की जुबान से राहुल-राहुल निकलने लगा.! जबकि भाजपा हमेशा कहती हैं हम राहुल गाँधी को सिरयसिली नहीं लेते है फिर सूचना व प्रसारण मंत्रालय की मुखिया के साथ पुरी सरकार और सभी प्रवक्ताओं की फौज राहुल पर हल्ला क्यों बोल गई? भाजपाई खेमे के हल्लाबोल का फायदा कांग्रेस को यह मिला कि जिन लोगों ने राहुल गांधी का भाषण नहीं सुना था, वे भी यू-ट्यूब पर राहुल गांधी, बर्कले खोजने लगे.! क्योकिं सबको पता हैं देश की मिडिया मोदी सरकार के हाथ बिक चुकी है, वो तो राहुल गाँधी का भाषन सुना नहीं सकते है.! अभी बर्कले के भाषण को भाजपा और संघ का खेमा ‘युवराज, शहजादा’ की बकबक साबित करने में जुटा ही था कि अमेरिका के ही प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में राहुल गाँधी फिर बोले. और भाषण में राहुल गांधी ने कुल 44 बार ‘नौकरी, इसका विकास और बेरोजगारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया.! महज तीन ही साल में अमेरिका की जमीन और मीडिया के विश्लेषण से यह दूसरा पाठ सामने आ गया.! भारत में तो सिर्फ प्रधानमंत्री के भाषणों की चीड़फाड़ होती थी कि उन्होंने अपने भाषण में ‘न्यू इंडिया’ और ‘टीम इंडिया’ शब्द का कितनी बार इस्तेमाल किया.! मेडिसन स्कवायर वाला इंडिया और प्रिंस्टन में बिना नौकरी वाला इंडिया.! इस दो तरह के इंडिया की टकराहट में भारत का भी विश्लेषण.! बर्कले के भाषण के बाद इन दिनों भाजपा के नए सहयोगी बने और मोदी सरकार के हर कदम की जमकर तारीफ करनेवाले नीतीश कुमार ने अति उत्साह में कह डाला कि भारत में वंशवाद की संस्कृति नहीं रही है यह कांग्रेस की देन है.! अब इन नए चीयरलीडर्स कुर्सी कुमार को कौन समझाए कि चंद्रगुप्त वंश, मौर्य वंश और लोदी वंश कोई अफ्रीकी नहीं बल्कि भारतीय इतिहास का हिस्सा रहे हैं.! वंशवाद हमारे प्राचीन से लेकर मध्ययुगीन समाज का मूल रहा रहा है जिसके खिलाफ आधुनिक समय में आवाज उठी है.! वह आधुनिक लोकतांत्रिक अवधारणा ही है जो इंसान के वंश नहीं उसकी काबिलियत की बात करती है.! राहुल गांधी ने कम से कम ईमानदारी तो दिखाई और उसे विदेशी जमीन पर कबूला.! साथ ही वंश के बजाए काबिलियत को आगे बढ़ाने की हिमायत की.! लेकिन भाजपा उस ईमानदारी पर चुप रहने के बजाए अपने बनाए नए भ्रम पर शोर मचाने लगे.! प्रिंस्टन में राहुल गाँधी के भाषण के बाद भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा कि राहुल रण क्षेत्र छोड़ कर भाग गए हैं और कांग्रेस के प्रचार के लिए दुनिया भर की यात्रा कर रहे हैं। माधव ने कहा कि उन्हें विदेशों में कांग्रेस का प्रचार करने दीजिए, हम भारत में राजनीति करेंगे.! लेकिन राहुल गाँधी पर इस हमले के पहले भाजपा गुजरे तीन सालों का वह समय भूल गई जब उनकी पार्टी के नेता और भारत के प्रधानमंत्री विदेशी जमीन पर भारत के उस विपक्ष पर तंज कसते थे, भारत को चोरो का देश बताते थे, भारत में पैदा होने पर शर्मिंदगी महसुस करते थे.! तब शायद भाजपा यह भूल गई थी कि लोकतांत्रिक अवधारणा में महज 31 फीसद वोट पाने के बाद भी वे सौ फीसद भारतीयों के प्रधानमंत्री हैं.! लेकिन विदेशी जमीन से लेकर उत्तर प्रदेश में दिए भाषणों तक अक्सर वे महज 31 फीसद लोगों को ही संबोधित करते सुने जाते थे.! वैसे अमेरिका की धरती पर दिए भाषणों की भारतीय राज और समाज में अपनी अहमियत रही है.! स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो में हुए धर्म संसद में जो ‘मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो’ कहा था, उसकी गूंज इतिहास के पन्नों में आज तक है। विवेकानंद ने कहा था, ‘मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी’। अमेरिकी शहरों में मोदी के भाषण और भीड़ को भाजपा खेमे ने कितना भुनाया वह इतिहास में दर्ज हो चुका है.! आज उसी अमेरिका की धरती पर राहुल गांधी मोदी के ‘न्यू इंडिया’ को चुनौती दे रहे हैं.बर्कले से लेकर प्रिंस्टन। राहुल के भाषण देते ही भाजपा आईटी सेल सोशल मीडिया पर पोगो, पप्पू, नानी घर और आलिया भट्ट के साथ गढ़ी गई उनकी बचकानी बातचीत वायरल करते हैं.! पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से ही भाजपा आईटी सेल और भारतीय गोदी मिडिया बोलने की कला को नेताओं का सबसे बड़ा गुण और कामकाज बताया जाने लगा, जिसमें मोदी को सबसे आगे तो राहुल गांधी को सबसे पीछे खड़ा कर दिया गया था.! लेकिन जनता ने पिछले तीन साल में यह भी समझ लिया कि सरकार बोलने से नहीं, उस पार्टी की विचारधारा और नीतियों से चलती है जो सत्ता में है.! पिछले तीन सालों में भारतीय राजनीति को वाद-विवादवाद-विवाद देशभक्ति देशद्रोही गाली जैसा का जैसा मंच बना दिया गया था उसके खिलाफ राहुल गांधी का यह नया पाठ तैयार होना सुखद कहा जा सकता है.! राहुल गांधी ने प्रिंस्टन में कहा कि जो लोग बाजार में एक दिन में 30 हजार नौकरियां पैदा करने में नाकाम रहने के लिए हमसे नाराज थे, वही लोग अब मोदी से भी नाराज हो रहें हैं, मुख्य प्रश्न इस समस्या को सुलझाना है.! नवउदारवाद की नाकामी के दौर में बहस का दो चेहरा बनाया गया.! बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के बरक्स मोदी का चेहरा तैयार किया गया था. और वहीं, मोदी को खारिज करने के चक्कर में उदारवादी विचारकों ने उनके हाथ मजबूत कर दिए.! संघ से जुड़े सभी संगठन इकट्ठा होकर इस बहस को मोदी के पक्ष में ले जाने में कामयाब भी हुए.! चाहे वह अखलाक का मामला हो, पहलू खान का या फिर गोरक्षकों का, लगातार कोशिश हो रही थी कि बहस इसी दिशा में जारी रहे.! संघ की भी यही कोशिश रही कि कांग्रेस भी उसी उदारवादी एजंडे में ही बंधी रहे.! जो विकल्प की बात हुई चाहे लालू यादव, नीतीश कुमार हों या गुजरात का राज्यसभा चुनाव उसमें भ्रष्टाचार के आधार पर ही मुकाबला किया गया.! इस उदारवादी बहस में कांग्रेस की छवि नकारात्मक ही बनी और संघ व भाजपा को भी कोई खतरा नहीं महसूस हुआ.! सांप्रदायिक बनाम उदारवादी बहस में कांग्रेस का विकास रोजगार एजंडा फेल हो गया.! यहां तक तो सब भाजपा के ही अनुकूल था.! बहस की दिशा बदलने में मददगार हुई नोटबंदी, जिसे भाजपा पूरी मोर्चेबंदी के बाद भी खारिज नहीं कर पाई.!
नोटबंदी और जीएसटी के बाद के आए नतीजों ने बहस का जो नया केंद्र दिया है राहुल गांधी के भाषण को उसी में समझा जाना चाहिए.! महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक चले किसानों के आंदोलन ने सवाल उठाए और जिस सूचना क्रांति, स्कील इंडिया, न्यू इंडिया के बल पर भारत के युवा बड़े सपने देख रहे थे उसी क्षेत्र में नौकरियों की भारी कटौती से पढे लिखे युवा गरीब किसान परेशान हुआ है.! जीएसटी के परिणामों का व्यापारियों में असंतोष है. जिसका असर कई राज्य में व्यापारियों नें अपनी दुकानें काम धंधा सबकुछ बंद करके सड़को पर नग्न प्रदर्शन भी किऐ.! शिक्षा से लेकर रोजगार तक के सवाल बेचैनी से उछल रहे हैं.! लोग अपने आप को मोदी से ठगा महसुस कर रहें हैं.! पेट्रोल की कीमतों से सब्सिडी हटाकर उससे मुनाफा कमाने की दिशा हो या शिक्षा के क्षेत्र में जीएसटी लगा उससे भी मुनाफे की राह पर धकेलना.! और इस समय राहुल गांधी उन 30,000 नौकरियों के बारे में सवाल करते हैं जो हर दिन दी ही जानी चाहिए.! यह बेरोजगार युवा, हताश किसान व्यापारी एवं देश को एक उम्मीद भरी किरण नजर आने लगी हैं.!
विदेशी जमीन से आई राहुल गांधी की यह भाषा नवउदारवाद समर्थक कांग्रेस की भाषा से अलग है.! उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसलिए गई कि रोजगार नहीं दे पा रही थी और मोदी-ट्रंप की सरकार इसलिए बनी कि लोगों को लगा था कि ये रोजगार देंगे.! राजनीति की भाषा में अपनी गलती को स्वीकार करना भी अपनी अहमियत रखता हैं.! फिलहाल राहुल गांधी की भाषा का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि वे अतीत की खामियों को स्वीकार कर कांग्रेस को ही कांग्रेस का विकल्प बनाने की बात कर रहे हैं. उनकी भाषा में जमीन से दूर रहे राहुल गांधी का विकल्प सीखते और स्वीकारते हुए राहुल गांधी को ही बना रहे हैं.! रोजगार से लेकर अहंकार तक में कांग्रेस की भूमिका का कटाक्ष भी कर रहे हैं पिछली सरकारों की गलतियों से सबक लेकर अपने मन की नहीं जनता के मन की बात बोले हैं.! वे जनता के मन को खारिज नहीं उसे छूने की कोशिश कर रहे हैं सुनने की कोशिश कर रहें हैं समझने की कोशिश कर रहे है.! ऐसा ही कुछ नजारा गुजरात दौरे में भी दिख रहा हैं.!
यह सही है कि एक-दो भाषणों से राजनीति की दशा और दिशा नहीं बदलती.! लेकिन इस बात को भाजपा समझ चुकी है लोकप्रियता ही सत्ता में नही ला सकती है, जिस तरह राहूल गाँधी अपने में बदलाव किऐ और छात्रसंघ चुनाव में जो परिणाम आ रहे है, राहुल गाँधी के भाषन ट्रेंड हो रहें है, हिट्स लाईक और एक सप्ताह में दस लाख फोलोवर बढे हैं.। गुजरात में जिस तरह साँफ्ट हिन्दुत्व, मंदिर-मंदिर जाना, हवन करना, लोगो की समस्या सुनना, उसका फेस टू फेस जबाब देना.और उसके समर्थन में गुजरात की जनता का जनशैलाब जो देखने को मिल रहा हैं कई पत्रकार भी हैरान है आखिर इतना बदलाव एक राष्ट्रीय नेता इतनी जल्दी कैसे कर लिया? इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के बाद हुऐ प्रचंड जीत अब के राहुल गाँधी के तेवर एक्शन बिल्कुल एक जैसा दिख रहा हैं.! इस बात की चिंता अमित शाह, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, विजय रुपाणी, आडवानी, शत्रुधन सिन्हा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समझ चुके हैं.! अटल बिहारी का भी लोकप्रियता सर आंखो पर था क्या हुआ 2004 में किसी नें सपने में भी नही सोचा था अटल बिहारी इतनी बुरी तरीके से हार जाऐंगे और बिना चेहरा के चुनाव लड़ने वाले , ना कोई अटल बिहारी के आसपास कांग्रेस में लोकप्रियता वाले नेता थे फिर भी जबरदस्त वापसी करके लगातार दस साल सरकार बनाई.! ऐसा ही 2019 में होना संभव है.!

विचारक: दीपक राजसुमन सिंह

 

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