500 women of zaura preparing 60 lakh khadi from chakra

 

शिवप्रताप सिंह जादौन, मुरैना। 27 साल से चरखा जौरा के 27 गांवों की 500 अल्पसंख्यक और निर्धन महिलाओं के घर का चूल्हा जला रहा है। करीब तीन दशक पहले इन महिलाओं ने बांस के चरखों को थामा था। महिलाओं ने इन चरखों को इतनी रफ्तार से चलाया कि अब यह महिलाएं मिलकर सालभर में 60 लाख रुपए की खादी तैयार करती हैं। यह खादी मुरैना सहित मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों में जौरा की खादी के नाम से एक ब्रांड के तौर पर बेची जाती है।

साल 1990 में जौरा के गांधी सेवा आश्रम में खादी का कपड़ा तैयार करने की छोटी सी इकाई शुरू हुई। यह इकाई अब खादी का कारखाना बन चुकी है। इस इकाई को जौरा इलाके की 500 महिलाएं चला रही हैं। यह महिलाएं अपने घर के काम के अलावा समय निकालकर चरखा चलाती हैं और कपास से सूत कातकर धागे तैयार करती हैं।

जौरा के 27 गांवों में इस तरह के 500 से अधिक चरखे चल रहे हैं। गांधी सेवा आश्रम जौरा से जुड़े रन सिंह परमार बताते हैं कि जौरा में खादी के उत्पादन को हैरतंगेज ढंग से बढ़ाने का सारा श्रेय इन्हीं महिलाओं को जाता है। इन महिलाओं ने खादी का काम पार्ट टाइम शुरू किया था, लेकिन अब यही खादी महिलाओं की आजीविका का मुख्य साधन बन गई है।

खादी कमीशन ने दिए आधुनिक चरखे

अब तक जौरा की यह महिलाएं बांस के चरखे चलाती थीं। महिलाओं द्वारा बनाई जा रही खादी की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए डिमांड के मुताबिक खादी में वैरायटी लाने के लिए आधुनिक चरखों की आवश्यकता थी।

खादी कमीशन को जब पता चला कि मध्यप्रदेश के एक छोटे से जिले मुरैना के जौरा विकासखंड से लगे गांवों की महिलाएं इतना बेहतर काम कर रही हैं तो खादी कमीशन ने इन महिलाओं को 500 आधुनिक चरखे उपलब्ध कराए। बांस के चरखों से यह महिलाएं पहले जहां 15 से 20 घुंडी (हजार धागों का गुच्छा एक घुंडी कहलाता है) तैयार करती थीं। वहीं अब यह महिलाएं हफ्ते में 50 घुंडियां तक तैयार कर लेती हैं, जिनकी इन्हें अच्छी कीमत मिलती है।

60 लाख की खादी हर साल पहुंचती है बाजार में

खादी के काम से जुड़ीं इन 500 महिलाओं के अलावा इलाके के करीब 30 ग्रामीण जौरा गांधी आश्रम में लगीं 10 कपड़ा निर्माण मशीनों पर काम करते हैं। जो 27 साल में बेहतर कारीगर बन चुके हैं। महिलाएं यहां अपने द्वारा काते गए सूत की घुंडी जमा कर कपास के बंडल ले जाती हैं। कारखाने में खादी तैयार होती है और जौरा, मुरैना सहित डिमांड के आधार पर देशभर में पहुंचती है। खादी के निर्यात के रिकॉर्ड बताते हैं कि जौरा से सालभर में 60 लाख की खादी बाजार में पहुंचती है।

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