MP government master stroke will depend on the mechanism

भोपाल। रिकॉर्ड पैदावार…पांच कृषि कर्मण अवार्ड…हजारों करोड़ रुपए का फसल बीमा वितरण…बिजली की उपलब्धता… सिंचित रकबे में वृद्धि…बिना ब्याज का कर्ज…एक लाख का खाद-बीज लेने पर 90 हजार की वापसी…और अब भावांतर भुगतान योजना।

लागत मूल्य की मांग को लेकर आंदोलन की राह पकड़ने वाले किसानों के लिए महाबोनस के तोहफे के रूप में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 16 अक्टूबर को मुख्यमंत्री भावांतर भुगतान योजना की शुरुआत करेंगे।

कृषि विशेषज्ञ इसे किसानों की समस्या के निदान में सिर्फ एक सहारा करार दे रहे हैं। उनका मानना है कि खेती की लागत बढ़ गई है। उस अनुपात में उपज के दाम नहीं मिल रहे हैं। वहीं राजनीतिक हलकों में इसे चुनावी साल का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है और वे इसे गेम चेंजर के रूप में देख रहे हैं पर इसकी सफलता का दारोमदार सरकारी तंत्र पर निर्भर करेगा वरना वही हाल होगा, जो किसान कल्याण की अन्य योजनाओं का हुआ।

मसलन फसल बीमा योजना में ढेरों खामियां हैं। समर्थन मूल्य का भी कई बार किसानों के बजाए व्यापारियों ने ज्यादा लाभ उठाया। मूंग-उड़द, अरहर की खरीद में यह स्पष्ट हो गया है। पूर्व कृषि संचालक डॉ. जीएस कौशल की मानें तो पांच साल पहले सोयाबीन के दाम 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल थे, जो घटते-घटते ढाई-तीन हजार रह गए हैं।

आयात नीति भी किसान की बर्बादी का बड़ा सबब है। जब किसान की फसल आती है तब आयात हो जाता है और बाजार में भाव गिर जाते हैं। इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार को देश में अपनी तरह की पहली भावांतर योजना लानी पड़ी क्योंकि प्याज के मामले में यही हुआ। प्रमुख सचिव कृषि डॉ.राजेश राजौरा की मानें तो सरकार ने किसानों के लिए कई कदम उठाए हैं। सुधार भी तत्काल किया जाता है।

गुणवत्ता का खाद-बीज चुनौती

गुणवत्तायुक्त खाद-बीज मिलना प्रदेश में किसान की सबसे बड़ी चुनौती है। इसमें फर्जीवाड़ा नई बात नहीं है। बालाघाट से सांसद बोधसिंह भगत हों या फिर उज्जैन जिले के विधायक बहादुर सिंह चौहान, विधानसभा तक में मुद्दा उठा चुके हैं। इसकी रोकथाम के लिए बीज-खाद के जो नमूने लेकर जांच की व्यवस्था है, उसको लेकर कृषि विभाग मैदानी अधिकारियों को निलंबित करने के अलावा आरोप पत्र थमा चुका है।

प्याज-मूंग के भुगतान का इंतजार

सरकार ने अच्छी मंशा के साथ किसानों को उपज का न्यायोचित दाम दिलाने के लिए प्याज से लेकर मूंग तक की खरीदी की लेकिन तंत्र की लापरवाही इस पर भारी पड़ी। अभी तक कई किसान भुगतान के इंतजार में बैठें हैं। खरीदी समितियों के स्तर पर हुई और गड़बड़ी भी लेकिन मुसीबत में फंसे किसान। बार-बार भुगतान के लिए चक्कर लगाने और जांच का सामना करने की नौबत आ गई।

व्यापारी के हाथ की कठपुतली न बनें किसान

भारतीय किसान संघ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुरेश गुर्जर का कहना है कि अब व्यापारी किसान का मालिक होगा। वो ऐसी दरों पर खरीदी करेगा, जिससे औसत विक्रय दर ही कम रह जाए। ऐसे में सरकार तो फायदे में रहेगी पर किसान को लागत मूल्य कभी नहीं मिल पाएगा।

पूर्व कृषि संचालक डॉ.जीएस कौशल ने भी गुर्जर की बातों का समर्थन करते हुए आशंका जताई कि औसत गुणवत्ता से कम की उपज बताकर खरीदी न करने का खेल चल सकता है। पूरी तरह व्यापारी के भरोसे किसान को नहीं छोड़ना चाहिए।

हालांकि, प्रमुख सचिव कृषि डॉ. राजेश राजौरा इन आशंकाओं को निर्मूल बताते हैं। उनका कहना है कि खरीदी के दौरान किसी को यह पता ही नहीं होगा कि मॉडल रेट क्या रहेंगे क्योंकि ये खरीदी बंद होने के बाद तय होंगे। ऐसे में व्यापारी तो अपने हिसाब से ही खरीदी करेगा। राशि का भुगतान किसान को होगा, इसलिए व्यापारी के नफानुकसान से इसका कोई लेना-देना नहीं है।

बोवनी और बीमित क्षेत्र में ही अंतर

फसल बीमा में लाखों किसानों को बीमा राशि बांटी जा चुकी है। इसे देखें तो सागर के हजारों किसानों को प्रीमियम देने के बावजूद योजना का लाभ नहीं मिला। पूर्व सीएम बाबूलाल गौर ने विदिशा में पंचायत सचिवों द्वारा किसानों से प्रीमियम की राशि लेकर जमा नहीं करने का मुद्दा उठाते हुए पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री को पत्र लिखा।

तंत्र की लापरवाही मुख्यमंत्री के सामने एक बैठक में भी आई। उन्हें बताया गया कि खरीफ 2016 के बीमा दावे के लिए जो बोवनी व बीमित क्षेत्र का आंकड़ा दिया गया, कई जिलों में अंतर है।

इसको लेकर कलेक्टरों को आंकड़े सुधरवाने और कार्रवाई करने के निर्देश भी देने पड़े। दूसरा पहलू किसानों को मामूली फसल बीमा राशि मिलना भी है। विपक्ष ने हाल ही में सीहोर के कुछ किसानों को चंद रुपए का बीमा मिलने को मुद्दा बनाया।

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