पवन बाली | मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की लगभग 3300 किलोमीटर की बहुचर्चित पैदल नर्मदा परिक्रमा को चलते 1 माह हो चुके हैं। 30 सितंबर को उनके गुरु आश्रम के नज़दीक बरमान घाट से शुरू हुई ये परिक्रमा, घाट दर घाट जातीय और धर्म के बंधनों को तोड़ते हुए नर्मदा जी के निश्छल जल की तरह कल-कल बहते हुए आगे बढ़ रही है।

बांद्राभान से होशंगाबाद के बीच ऐसा मंजर देखने को मिला जब दिग्विजय सिंह के माथे पर त्रिपुंड लगा हुआ था और वे नर्मदा जी के जयघोष के साथ आगे बढ़ रहे थे तब रास्ते मे एक मदरसा पड़ा जहां मुस्लिम भाइयों ने उनका स्वागत किया और मदरसे में पढ़ने वाले बच्चे उन्हें खींचकर अंदर ले गए और वहां सभी बच्चों के साथ मौलवी ने दुआ पढ़ी जिसमे उन्होंने कहा कि हम अल्लाह से ये दुआ मांगते हैं कि दिग्विजय सिंह जी की इस कार्य मे कोई मुश्किलें न आये और सफलता के साथ परिक्रमा पूर्ण हो। सर्वधर्म समभाव की अवधारणा को मानने वाले दिग्विजय सिंह जी के लिए ये क्षण उन्हें भावुक कर देने वाला था। इसी तरह हर गांव में ग्रामीण जन बड़े ही श्रद्धा भाव से परिक्रमावासियों का स्वागत कर रहे हैं, किसी को बुलाया नही जा रहा, लोग स्वप्रेरणा से फूल और पत्ते लेकर अपने-अपने घरों के बाहर खड़े होकर स्वागत के लिए उत्साहित नज़र आ रहे हैं।

राजनीति के महारथी कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा ने दलगत राजनीति को भी पीछे छोड़ दिया है। आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद, भाजपा समर्थित लोग स्वतः उनके स्वागत के लिए आगे आ रहे हैं। अभी कल ही की बात है जब उन्होंने निमाड़ क्षेत्र में बीजेपी से 4 बार विधायक रहे रघुराज सिंह तोमर को न सिर्फ याद किया बल्कि तोमर उनसे मिलने आये तो उन्हें गले से लगा लिया। दिग्विजय सिंह की कार्यशैली ये दर्शाती है कि दलों की भिन्नता विचारधारा की वजह से है, दुश्मनी से नही। देश में रहने वाले सभी लोग भाई-भाई हैं, कम से कम कांग्रेसी तो आज भी यही मानते हैं।

दिग्विजय सिंह की इस परिक्रमा की तीन और खास बात है जो चर्चा का विषय है, पहला आकर्षण का केंद्र उनकी धर्म पत्नि अमृता सिंह जो बहुत ही सहज तरीके से ग्रामीण महिलाओं से मिलती हैं उनके साथ भजन गाती हैं। वे ग्रामीण महिलाओं की बात बहुत ध्यान से सुनती हैं, उनकी समस्याओं पर मनन करती हैं। वे इस दौरान डायरी भी लिख रही हैं। दूसरे सबसे ज्यादा आकर्षण के केंद्र हैं दिग्विजय सिंह से उम्र में बड़े उनके सखा पूर्व सांसद रामेश्वर नीखरा, जो उम्रदराज़ होने के बावजूद पैदल उसी तेज़ी से चल रहे हैं जितना तेज़ी से दिग्विजय सिंह चलते हैं और यहां मैं आपको बताना चाहता हूँ कि जिस तेजी से दिग्विजय सिंह चलते हैं उस तेज़ी में चलने में युवाओं के पसीने छूट रहे हैं। तीसरे व्यक्ति जो चर्चित हैं वे हैं दिग्विजय सिंह के छोटे भाई पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह जो कि परिक्रमा में सबसे आगे चलते हैं, गांवों में पहले पहुंचकर ग्रामीण जनों से चर्चा करते हैं, व्यवस्थाएं देखते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

एक महीने की इस परिक्रमा में स्थाई परिक्रमावासियों की संख्या लगभग 140 हो गई है और दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। दिग्विजय सिंह जी कहते हैं कि उन्होंने खाली हाथ परिक्रमा शुरू की थी लेकिन नर्मदा माई की कृपा ऐसी बरस रही है कि रोज़ परिक्रमावासियों को कोई न कोई कुछ न कुछ भेंट करता ही है। वे एक बात रोज़ दोहरा रहे हैं कि नर्मदा जी की परिक्रमा का अनुभव जानना है तो एक बार पैदल परिक्रमा कर के देखें। वास्तव में नर्मदा जी के तट पर आनंद की अनुभूति होती है।

नर्मदा जी की ये परिक्रमा धर्म और जाति के दो किनारों को मिलाते हुए चल रही है। राजनैतिक पंडित कुछ भी कयास लगाते रहे, लेकिन कड़ी धूप में पैदल चलने वाली ये यात्रा प्रथमदृष्ट्या तो विशुद्ध धार्मिक ही प्रतीत हो रही है क्योंकि कोई भी व्यक्ति राजनैतिक लाभ के लिए इतना कष्ट नही सह सकता, सिर्फ और सिर्फ नर्मदा जी की असीम कृपा और धार्मिक निष्ठा व प्रतिबद्धता से भरा व्यक्ति ही इतना बड़ा निर्णय ले सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पर ये कृपा हुई है और वे धर्म की इस यात्रा में नित-प्रतिदिन धर्मराज के रूप में खरे उतर रहे हैं।

नर्मदे हर।

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