गुजरात और हिमाचल में भाजपा की जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिखाया कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का जादू आम आदमी के सिर चढक़र बोल रहा है। इन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने मोदी के नाम पर गुजरात तो बचाया ही, हिमाचल को भी कांग्रेस से छीन कर अपने खाते में एक और राज्य का इजाफा कर लिया है। जाहिर तौर पर इस जीत का जश्र दिल्ली से लेकर हर शहर और गांव में मनाया जा रहा है।

क्योंकि भाजपा ने आज दो राज्य तो जीते ही,इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उसने वह गुजरात बचा लिया, जिससे प्रधान मंत्री मोदी की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। गौर से देखा जाए तो जीत बड़ी हिमाचल की है। लेकिन भाजपा को राहत गुजरात की जीत ने प्रदान की है। इसलिए यदि यह कहा जाए कि यह जो जश्र देश भर में दिखाई दे रहा है, वो हिमाचल मिलने का कम बल्कि गुजरात के बच जाने का ज्यादा है।

क्योंकि वहां पाटीदार आंदोलन, पटेल आंदोलन, जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दे जिस आक्रामकता के साथ हार की आशंकाओं को बढ़ावा दे रहे थे, उसने भाजपा की पेशानी पर बल पैदा तो कर ही दिए थे। ये बात और है कि समय रहते मोदी ने अपने चिर परिचित अंदाज में वहां के चुनाव को अपने मन माफिक मोड़ दिया और अंतत: जीत हासिल कर ही ली। इसलिए यदि ये कहा जाए कि ये जीत भाजपा की न होकर कांग्रेस की है, तो अतिश्योक्ति नही होगी। कारण साफ है, हिमाचल और गुजरात में कांग्रेस की ओर से जहां चुनाव की कमान शत प्रतिशत राहुल गांधी के हाथ में थी तो भाजपा की जीत का पूरा दारोमदार मोदी के ऊपर निर्भर स्पष्ट नजर आ रहा था।

कारण साफ है कि वर्तमान में गौर से देखा जाए तो दोनो ही पार्टियां व्यक्तिवाद ज्यादा नजर आने लगी हैं। क्योंकि एक ओर जब भाजपा की बात आती है तो राष्ट्रीय स्तर पर मोदी तथा कांग्रेस की बात पर राहुल का नाम मस्तिष्क में आ जाता है। अत: ये हार जीत दोनों ही तरफ से पार्टी की न होकर व्यक्तियों की ही मानी जाएगी। लेकिन जब इन चुनावों की समीक्षा होगी तो दोनों नेताओं के दायित्वों के मायने अलग अलग सामने आने तय हैं। जैसे हिमाचल और गुजरात में कांग्रस की हार है तो राहुल गांधी की ही हार।

लेकिन गौर से देखा जाए तो ये पहला ऐसा चुनाव था, जब उनके साथ चुनावी मंचों पर सोनिया, प्रियंका में से कोई भी कतई मौजूद नही था। जबकि यही वो चुनाव भी था, जिसमें राहुल गांधी पर विरोधियों के ज्यादा हमले हुए। फिर भी वो इस चुनाव में बहुत ज्यादा संयमित और पहले से ज्यादा आक्रामक नजर आए। दो राज्यों में हार के बाद भी इसे कांग्रेस के लिए एक अच्छा लक्षण कहा जा सकता है। अब मोदी की बात करें तो हम पाएंगे कि भाजपा में अभी कोई चेहरा ऐसा है ही नही जिसे आम आदमी मादी के विकल्प के रूप में दखना चाहता हो।

और यदि पार्टी की बात की जाए तो वहां के हालात भी यही हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में ऐसा कोई चेहरा है ही नही जो मोदी का पर्याय बनने की माद्दा रखता हो। शायद यही वो वजह है कि आज जब भाजपा के दिल्ली स्थित मुख्यालय में प्रधान मंत्री और भाजपा अध्यक्ष जीत का जश्र मनाने पहुंचे तो वहां पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोश के साथ पीठ थप थपाई।

वर्ना जो लोग जनसंघ और भाजपा को नजदीेक से जानते हैं, उन्हें यह मालूम होगा कि इस संगठन में पार्टी द्वारा सत्ता को नियंत्रित किये जाने की परम्परा रही है, न कि सत्ता द्वारा संगठन को चलाए जाने की। लेकिन आज भाजपाई सत्ता के सरदार और पार्टी के मुखिया जीत के बाद पहली बार आमने सामने मिले तो पीठ सत्ता के सरदार ने पार्टी के मुखिया की थपथपाई, वह भी भाजपा मुख्यालय में। स्पष्ट है कि ये परिवर्तन इसलिए सामने आया, क्यों कि वर्तमान में चाहे पार्टी हो या फिर संगठन हर तरफ भाजपायी खेमे के भीतर मोदी लहर की स्थापना अपना रूतबा बनाए हुए है।

नतीजतन यह कहा जा सकता है कि आज की हार जीत मोदी और राहुल की अपनी अपनी व्यक्तिगत प्राप्तियां हैं, फर वो चाहे सफलता की हों या फिर असफलता की। इस नजरिये से देखा जाए तो आज के विधान सभा चुनाव परिणाम ने फिलहाल तो हर हर मोदी और हर हार राहुल की नई कहावत गढ़ दी है, जिसे जनता ने तो मान ही लिया है अब इस सच्चाई को दोनों ही दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी मान लेना चाहिए। साथ ही दोनों पार्टियों को इन चुनाव परिणामों को एक सीख के रूप में भी लेना होगा।

वह ये कि कांग्र्रेस को यदि आने वाले समय में उपलब्धियों को प्राप्त करना है तो उसे खुद को शासक होने के भ्रम से बाहर निकल कर मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित करना चाहिए। वहीं भाजपा को यह मानकर चलना होगा कि हिमाचल उसने भले ही कांग्रेस से छीन लिया हो, लेकिन उसे गुजरात की जीत बहुत सस्ती नही पड़ी है। एक प्रधान मंत्री के गृहराज्य में जीतने के लिए पूरी केंद्र सरकार का जुट जाना और भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों द्वारा चुनाव प्रचार करना बहुत ज्यादा कामयाबी का लक्षण नही माना जा सकता।

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