भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तीन दिवसीय समिट में प्रमुख सचिव बी.पी. सिंह ने ऐसा कुछ कह दिया, जो आम होते ही यह संकेत दे गया कि शासन और प्रशासन के बीच ऐसा कुछ तो चल रहा है जिसके लिए राजी खुशी जैसा शब्द इस्तेमाल नही किया जा सकता।

बता दें कि बीतेे रोज बी.पी. सिंह ने अपने आइ.ए.एस. साथियों से ये कह दिया कि वे नेताओं के हिसाब से नही, अपने हिसाब से काम करें। जबकि मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान इसी समिट में यह कहते नजर आए कि हम सब यहां काम करने ही आए हैं। लेकिन कुछ अफसर हैं कि जो काम करना ही नही चाहते। ये परस्पर विरोधाभासी कथन यह दर्शा रहे हैं कि शासन प्रशासन के बीच सब कुछ सामान्य नही है।

अब बात करते हैं कि इन बयानों में हमारी लोक तांत्रिक व्यवस्था किसे सही ठहराती है और किसे गलत। यदि नीचे से शुरूआत करें तो पंच, सरपंच, जनपद अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष, पार्षद, नगरीय निकायों के अध्यक्ष, महापौर, मेयर, और यहां तक कि विधायक और सांसद भी शासक के रूप में नीचे से ही चुनकर आतें हैं। जबकि हमारी संवैधानिक व्यवस्था ने इनके सहयोग के लिए ग्राम सचिव, जनपद सीईओ, जिला पंचायत सीईओ, नगरीय निकायों के सीएक ओ, आयुक्त, सचिव और प्रमुख सचिव जैसे पद निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की सहायता करने, उनके द्वारा दिए जाने वाले निर्देर्शों को संवैधानिक दायरे में क्रियान्वित करने के लिए उपलब्ध कराया है।

तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि यानि कि शासक निर्देश प्रदान करेंगे और प्रशासनिक ढांचे के तहत उपलब्ध अधिकारी उनके द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों के तहत कार्य का निष्पादन करेंगे। तो फिर यह कहने की गुंजाईश ही कहां बचती है कि अधिकारी नेताओं के हिसाब से नही, अपने हिसाब से काम करें। दूसरी बात, नेता अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होता है। अत: उसका ये लोकतांत्रिक धर्म है कि वो जनता के कार्य करने के लिए अधिकारियों से कहे और कार्य समय पर हो जाए, इसकी चिंता भी करे।

अब यदि ऐसे में अधिकारी नेता के हिसाब से काम करना बंद कर दें तो नेता तो जनता के बीच से बहिष्कृत ही हो जाएगा। तो फिर नेता काम करने के लिए क्यों न कहे और यदि कहे तो अधिकारी को क्या अधिकार रह जाता है कि वो काम के लिए मना कर दे। तर्क दिए जाते हैं कि नेतागण अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं के कार्यों के लिए अधिकारियों पर दवाब बनाते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि दवाब क्यों न बनाएं, यदि कार्यकर्ता का काम विधि सम्मत है और उसके लिए उसका नेता यदि सिफारिश करता है तो इसमें गलत ही क्या है?

वैसे भी ध्यान देने की बात ये है कि आइ ए एस अपने को पद के योग्य बनाने के लिए एक सुनिश्चित परीक्षा प्रणाली की औपचारिकता पूरी करता है। लेकिन नेता यानि शासक को तो हर पांच साल में मतदाता के सामने परीक्षा देनी है। यदि उसने काम कराए होंगे तो पास हो जाएगा, वर्ना फैल। तब बात यही सामने आती है कि यह बहुत जरूरी है कि प्रशासनिक अधिकारी अपने नेता शासक मंत्री विधायक और सांसद की बात सुने और सरकार की मंशानुरूप उसके निर्देशों को मूर्त रूप प्रदान करे। लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी है कि जनप्रतिनिधि भी अपनी मर्यादाओं को पहचानें और भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी संस्था से चुन कर आए अफसरों के मान सम्मान का ध्यान रखें।

जैसा कि मुख्य मंत्री ने कहा कि हम सभी यहां पर काम करने ही तो आए हैं। तो फिर इंकार का सवाल ही कहां उठता है। लेकिन उसके लिए जरूरी है कि नेता किसी भी प्रकार का सार्वजनिक वचन देने से पहले यह विचार विमर्श भी तो कर लें कि वो जो कहने जा रहे हैं, संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत कहे को सार्थक करन या कराना संभव हो पाएगा या नही। आजकल जो कुछ देखने में आ रहा है वो कहीं कहीं प्रतिठा का सवाल बनकर बात का बतंगड़ भी ज्यादा बनता नजर आता है।

इसका मतलब तो यही हुआ कि एक ने दूसरे से कुछ ऐसा कहा जो सुनने वाले को असम्मान जनक लगा और उसने ठान लिया कि अब काम करना ही नही है। ऐसी परिस्थिति लोकतांत्रिक देश में घातक हो सकती हैं। क्यों कि इस व्यवस्था में शासक और प्रशासक एक दूसरे के पूरक हैं, न कि प्रतिद्वंदी। अत: शासक काम तभी करा पाएगा, जब प्रशासक उसके कहे अनुसार कार्य को सम्पादित करेगा। लिखने का आशय ये कि नेताओं को भी ये चाहिए कि वे गुस्से में आकर अपने सहयोगी संस्थान पर भूलकर भी ऐसे शाब्दिक प्रहार न करें जो सरकार के काम काज में अवरोध उत्पन्न करें।

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