The unsettled peasant entangled in the illusion of Bhavantak

भावांतर के भ्रमजाल में उलझा फिर बेबस किसान (सुबह सवेरे में ग्राउंड रिपोर्ट) भोपाल के करोद अनाज मंडी में जहां एक तरफ बडे शोर शराबे के साथ सोयाबीन की बोली लग रही थी उससे थोडी दूर पर हिनौती गांव के किसान धनराज फर्श पर फैला अपना सोयाबीन बोरियों में समेटने में लगे हुये थे। पके हुये किसानी चेहरे पर ढेरों उदासी थी। पूछने पर बताया कि बडी उम्मीदों से सोयाबीन बेचने के लिये लाये थे मगर बिक क्या रहा है मजाक हो रहा है। सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3050 रूप्ये प्रति क्विंटल है मगर यहां पर इक्कीस सौ या बाइस सौ रूप्ये क्विंटल का रेट लग रहा है। हमने ग्यारह एकड में सोयाबीन लगाया था निकला सिर्फ सात आठ बोरा अच्छा खासा खर्चा पानी करने के बाद भी यदि सही रेट मिले तो हमारी लागत ही निकलेगी फायदा कमाने हम यहंा नहीं आये हैं। वो तो सर पर 15 हजार का बिजली का बिल और अम्मा की बीमारी के लिये पैसा चाहिये वरना अभी इसे बेचने की जल्दबाजी नहीं है। फिर क्या करोगे आप। वापस ले जायेंगे या फिर मंडी के बाहर के किसी व्यापारी को बेच देंगे क्योंकि टैक्टर भी एक दिन के किराये पर लाये हैं। और भावांतर। अरे यहंा फसल के भाव ही नहीं मिल रहे अंतर कब मिलेगा भगवान जाने। मंडी में ही इझगिरी गांव के मोहम्मद सलीम आये हुये हैं। अपनी पंद्रह एकड जमीन में अच्छी क्वालिटी का ग्यारह बोरा सोयाबीन बोया था मगर वक्त की मार ऐसी पडी कि निकला सिर्फ छह बोरा सोयाबीन और बिका है बाइस सौ रूप्ये क्विंटल यानिकि हाथ में आये तेरह हजार रूप्ये और सिर्फ बीज की कीमत आयी थी पैंतीस हजार रूप्ये। सलीम बताते हैं कि पचास हजार की फसल लगायी है और मिल रहे हैं ज्यादा से ज्यादा पंद्रह हजार अब ऐसे में क्या हम खेती करें और क्या बच्चे पालें। और भावांतर। अरे सर यदि ये सोयाबीन पच्चीस सौ से जयादा का बिकता तब मिलता भावांतर का फायदा अब तो जितना मिला है लेकर चुपचाप जा रहे हैं घर। आपने सुनी होगी वो कहावत कब नौ मन तेल होगा कब राधा नाचेगी ये हाल है भावांतर का। पास में खडे ज्वाला प्रसाद मीणा कहते हैं कि ऐसी हवाई योजनाओं से कुछ नहीं होगा साहब जब तक ये सोयाबीन साढे तीन से चार हजार रूप्ये क्विंटल नहीं बिकेगा हम किसानों को एक पैसे की बचत नहीं होगी। अब इससे ज्यादा मजाक क्या होगा कि भोपाल की इस सरकारी मंडी में भी हम अपनी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं बेच पा रहे हैं औने पौने दाम पर बेच कर जा रहे हैं अपनी पसीने से सींच कर उगायी फसल और वो भी चेक लेकर जिसकी नकदी हमें चार या पांच दिन बाद मिलेगी। घर पर बच्चे ये सोच कर इंतजार कर रहे हैं कि पिता जी मंडी में फसल बेचकर लौटेंगे तो मिठाई या कपडे लायेंगे यहंा मिठाई तो छोडिये लौटने के लिये टैक्टर में डीजल डालने के लिये कई बार चंदा करना पडता है। मंडी में किसानों की ये बातें सुन सुनकर हैरान था कि जिन किसानों की किसानी के दम पर मध्यप्रदेश सरकार लगातार कषि कर्मण पुरस्कार जीत कर अमेरिका तक में अपनी पीठ थपथपाती है वो किसान इस बुरे हाल में क्यों आ गये। फिर भावांतर को तो किसानों का सुरक्षा कवच कहा जा रहा है कि फिर कहां है वो कवच। हैरानी तो उस वक्त हुयी जब समसपुरा गांव के मुन्ने खां से मिले। टैक्टर ट्राली में उडद की उपज लेकर आये हैं। पांच हजार पांच सौ रूप्ये उडद का न्यूनतम समर्थन मूल्य है मगर उनकी उडद की बोली लग रही है आठ सौ से लेकर बारह सौ रूप्ये क्विंटल तक की। सात हजार रूप्ये क्विंटल का बीज लिया था तकरीबन लाख रूप्ये लागत आयी थी बीस बोरा उडद निकली है हजार रूप्ये किलो भी बिका तो बीस हजार रूप्ये हिस्से में आयेंगे। अस्सी हजार का नुकसान हो रहा है मगर फिलहाल तो इस नफे नुकसान को भुलाकर फसल बेचने की जल्दी है क्योकि खाद बीज और बिजली का बकाया जो चुकाना है। अपनी फसल को औने पौने दाम पर बेचने वाले ये किसान भावांतर के भ्रमजाल में उलझे पडे हैं। भावांतर का अर्थ ये जो समझे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और बिक्री के मूल्य का अंतर सरकार उनके खाते में डालेगी मगर सरकार ने माडल मूल्य तय करने के जो पैमाने बनाये हैं उसके आधार पर इन किसानों को पैसा खातों में आयेगा कब आयेगा ये कोई बताने वाला नहीं है। वैसे भी प्रदेश में करीब पचास लाख किसान हैं और भावांतर में लगभग बीस लाख किसान ही पंजीयन करा पाये हैं। बाकी के अन्नदाताओं का क्या होगा ये मेरा कहना ही था कि पास में खडे किसान सुरेश मीणा ने हाथ जोडकर कहा भाईसाहब हमें अन्नदाता की जगह भिखारी कहो तो सुन लेगें मगर ज्यादा महिमामंडित मत करो बस हमें हमारी फसल की सही कीमत दिला सको तो दिला दो बडी मेहरबानी होगी। बारह साल से सुन रहे हैं अन्नदाता अन्नदाता,,,,,

ब्रजेश राजपूत,

एबीपी न्यूज,

भोपाल

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