मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री लाल सिंह आयै को लेकर अब राजनीति गर्माने लगी है। अत: विपक्ष की ओर से सरकार और भाजपा के खिलाफ तीखे बयान आने शुरू हो गए हैं। इस बार सत्ता पक्ष से लोहा लेने की भूमिका में विधान सभा के नेता प्रतिपज्ञक्ष अजय सिंह सामने आए हैं।

उन्होंने दावे के साथ यह आरोप लगाया है कि वर्तमान में मध्यप्रदेश दो तरह के कानूनों से संचालित है। इसमें से एक कानून आम आदमी के लिए, जबकि दूसरा सत्ता पक्ष में बैठे अति विशिष्ट लोगों के लिए है। खासकर मंत्रियों के मामले में तो हालात ऐसे हैं कि कानून खुद ही अपने अस्तित्व को लेकर खुद को ऊहापोह की स्थिति में पा रहा है। जाहिर तौर पर उन्होंने ये बात मंत्री लाल सिंह आर्य के मामले में कही।

जैसा कि सर्व विदित है कि लाल सिंह आर्य पर हत्या का आरोप चस्पा है। उस मामले में उनके अब तक 7 वारंट जारी हो चुके हैं। हद तो ये है हालिया वारंट गैर जमानती निकाला गया है। लेकिन कितनी हास्यास्पद बात है कि जो मंत्री मुख्यमंत्री से मिल लिए, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी उठ बैठ लिए, लेकिन उस दल को नही मिल रहे जो उनकी गिरफ्तारी के लिए भोपाल की खाक छानता फिर रहा है। उस पर तुर्रा ये कि सरकार कानून की पालना कराने की बजाय अपने मंत्री को संरक्षण प्रदान कर रही है।

चूंकि लाल सिंह मंत्री पद पर हैं,अत: उनकी विधि सम्मत गिरफ्तारी में भी संवैधानिक अड़चनें हैं। इसलिए होना तो यह चाहिए था कि मुख्य मंत्री अपनी सदाशयता का परिचय देते हुए, लाल सिंह का इस्तीफा लेते और उन्हें खुद कानून के हवाले करते। लेकिन हो इसका उल्टा रहा है। जिस भाजपा की सरकार मध्य प्रदेश में उसके प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार सिंह चौहान कह रहे हैं। कि वारंट से क्या होता है।

जब तक अग्रिम जमानत नही हो जाती तब तक क्या जरूरी है कि खुद को पुलिस के हवाले किया जाए। यही वजह है कि आज पत्रकारों से रूबरू होते हुए अजय सिंह ने कहा कि सरकार और सरकार में बैठी भाजपा का यह आचरण न तो विधि सम्मत ही है और न ही नैतिक स्तर पर खरा। उन्होंने उस मामले को भी मंत्री लाला सिंह मे प्रकरण से जोड़ा जिसमें एक पत्रकार को कुछ गलत ट्वीट कर देने पर उसके खिलाफ तो रासुका जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा पंजीबद्ध कर लिया जाता है, और दूसरी तरफ एक मंत्री को हत्याकांण्ड जैसे संगीन मामले में संरक्षण प्रदान किया जा रहा है।

यानि कि प्रदेश में आम आदमी और मंत्रियों के लिए अलग अलग कानून काम कर रहा है। हत्या के आरोपी को संरक्षण भी बत जब मंत्री पर हत्या का मामला पुलिस की पहल से न होकर वह अदालत के आदेश पर चस्पा किया गया है। फिर तो सरकार को मंत्री की गिरफतारी का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए था। वैसे वर्तमान मुख्य मंत्री शिवराज चौहान को इस मामले में अपनी ही पार्टी की पूर्व मुख्य मंत्री सुश्री उमा भारती से सबक लेना चाहिए। जब उनका कर्नाटक सरकार की ओर से गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था तो उमाभारती ने अपने पद से इस्तीफा देकर न्यायालयीन वारंट का मान रखा था, और मुख्य मंत्री जैसा बेहद महत्वपूर्ण पद छोडक़र कर्नाटक की ओर कूच किया था।

ये बात और है कि सत्ता की चाशनी चाटने के लिए टकटकी लगाए बैठे कुछ लोगों ने वापिस आने पर उमाश्री को दुबारा मुख्य मंत्री की गद्दी पर बैठने नही दिया था। उसी घटना का परिणाम है कि जो सत्ता भाजपा के लिए एक महिला ने दिग्विजय सिंह से छीनी थी,उस पर आज शिवराज सरकार विराजमान है। कुल मिलाकर अजय सिंह का इस सरकार के खिलाफ यह आरोप लगाना गैर वाजिब नही है कि भाजपा के नेता और उसके द्वारा सत्ता में बिठाए गए नेता कम से कम कानून का ठीक तरह से पालन तो नही कर रहे हैं।

जबकि इससे सरकार की ही छवि प्रदेश भर में धूमिल हो रही है। जगह जगह मंत्री के लापता होने और फरार हो जाने सम्बन्धी पोस्टर लग रहे हैं। इससे जनता के बीच गलत संदेश तो जा ही रहा है। एक गलत परम्परा का सूत्रपात भी होरहा है। वह भी उस पार्टी के द्वारा जो अभी तक चाल चरित्र और चेहरे में एक नीति की बात करती रही है। अजय सिंह ने सही कहा है कि विपक्ष तो अपना धर्म निभा रहा हैऔर आगे भी निभाता ही रहेगा। अभी मुख्य मंत्री को पत्र लिख रहे हैं। बात नही सुनी गई तो आंदोलन भी करेंगे।

उसके बाद भी सरकार को सदबुद्धि नही आती है तो फिर अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव में जनता सही गलत का फैसला करने वाली है। कुल मिलाकर सरकार को समय रहते अपने कर्तव्य का बोध होना ही अपरिहार्य है। वर्ना कहीं ऐसा न हो जाए कि अदालत को कड़ा कदम उठाना पड़ जाए। यदि ऐसा हुआ तो यह न्यायपालिका और विधायिका के बीच तनाव का सबब बनने वाला मामला भी बन सकता है। यदि ऐसा हुआ तो गलती सिर्फ और सिर्फ भाजपा और उसकी सरकार की ही होगी।

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